एक लेखिका के दिल की कुछ अनकहीं बातें : रश्मि तारिका/ A short interview with Rashmi Tarika ji

नाम : रश्मि तरीका
जन्म दिवस :२५ जुलाई १९६८
मूल स्थान :  हिसार ,हरियाणा
शैक्षणिक उपाधि : बी.ऐ . ( ज़िन्दगी में जब भी, जो भी, जिससे भी  सीखने को मिले सीखना और अपनाना  ..इसकी कोई डिग्री नहीं )

1. स्वभाव : 

भावुकता और सादगी से लबरेज़ स्वभाव की वजह से कई बार भावनाएं आहत होती हैं ,फिर भी किसी को पलटकर जवाब देने से  बेहतर ख़ामोशी इख्तीयार कर लेती हूँ जब सामने वाला गुस्से में होता है ! कभी कभी ये ख़ामोशी मेरी कमज़ोरी बन जाती है तो कभी मेरा हथियार (जब मुझसे झगड़ने वाला इंसान अपनी गलती महसूस कर लेता है ) !  फिलहाल..” वक्त बदला तो कुछ हम बदले …ज़िन्दगी ने जब भी अपने रंग बदले ” ! पति और बच्चों के प्यार ने मज़बूत बना दिया है ..तो कुछ अपनों ने ..दोस्तों ने बिंदास बना दिया है ! गुरु सिमरन से  ज़िंदगी और भी आसाँ  हो गई है !

2. खास शौक :   

बारिश के मौसम में पति के साथ लॉन्ग ड्राइव पर जाना ..भुट्टा खाना ..चाय की चुस्कियों के साथ पुराने फ़िल्मी संगीत का मज़ा लेना ..मेरा ऑल टाइम फेवरेट शौक है ! इसके अलावा पढ़ना और खूब नए साहित्यकारों की रचनाएँ और किताबे पढ़ना ! कभी कभी ख़ुशी के पलों को घर में ही चाय की चुस्कियों को कैंडल लाइट डिनर सा माहौल बना कर सहेज लेती हूँ ! आजकल लिखना मेरा विशेष शौकों की फेहर लिस्ट में सर्वोपरि है !

3. लोकप्रिय व्यक्ति : 

ईश्वर की इस खूबसूरत सरंचना में हर इंसान खूबसूरत है ..लेकिन जिसका मन भी बहुत सुन्दर है वह इंसान  हर जगह ..हर दिल में लोकप्रियता का हक़दार बन जाता है …बेशक फिर वह इंसान कोई अंजाना सा हो या अपना हो ! यही मेरे  शब्दों में लोकप्रिय होने की परिभाषा है और इस शब्द को मेरा परिवार परिभाषित करता है ! अगर व्यक्ति विशेष को लोकप्रिय अवार्ड दूँ तो मैं ..अमिताभ बच्चन जी को दूंगी ! उनके व्यक्तित्व सा कोई सानी नहीं !

4. साहित्यिक प्रेरणा :

लफ़्ज़ों के सेहन में जब कदम रखा तो कभी छोटी छोटी तुकबंदी बना कर शायरी का जामा पहना दिया ..कभी मन के भावों को कविताओं में ढाल दिया …कभी ज़िन्दगी और आस पास की घटनाओं को लेखो और कहानियों में समेट दिया ..लेकिन इस लफ़्ज़ों की रवानगी के पीछे कुछ तो था जो मुझे लिखने की और प्रेरित कर रहा था …आसपास  कोई साहित्यक माहौल तो नहीं था पर मुझ में शायद मेरी माँ की धार्मिक प्रवृति के बीज प्रतियोपित बचपन से ही हो  गए थे जोकि शादी के भी कितने अरसे बाद अंकुरित हुए ! फिर इन लफ़्ज़ों से मेरी मुहब्बत को पहचाना शील निगम जी ने और उन्होंने मुझे प्रोत्साहित किया और लिखने को ! मेरी लिखने की कला को कभी पहचाना दिलबाग विर्क जी (म्हारा हरयाणा ) ,कभी ओजस्वी कौशल ( कैच माई पोस्ट ) ने , कभी रश्मि प्रभा जी ने ( नारी विमर्श के अर्थ पुस्तक ) , कभी लेखनी की शैल अग्रवाल जी द्वारा .. कभी रहीम खान जी द्वारा ( खबरयार ),तो कभी पवन जैन जी द्वारा ( आगमन ) जहाँ से मुझे सूरत का साहित्यक सयोंजक बनाकर मुझे  सम्मान भी मिला और आगे बढ़ने की प्रेरणा भी मिली ! लफ़्ज़ों के इस अथाह सागर में बहुत बेशकीमती लोगो से मिलने …समझने और उन्हें पढ़ने का अवसर मिलता गया और मेरी लेखनी में भी निखार आता गया ! हर वह इंसान जिससे पढ़ने, समझने और सीखने का अवसर मिला और वह मेरी इस साहित्यक प्रेरणा का सबब बनता गया !

5. पंसदीदा परिवेश  : 

मेरे गुरुओं का दरबार …मायके का आँगन जो अब हिसार से चंडीगढ़ में महकता है …पर फिर भी हिसार के उस काफी साल पहले छोड़े हुए घर की मधुर स्मृतियाँ मेरे ज़ेहन में बसी हैं ! धार्मिक स्थल चाहे अमृतसर का गोल्डन टेम्पल हो या सूरत का ही कोई भी मंदिर ..मन को सुकून देते हैं .!

6. पंसदीदा व्यंजन :

चाय ..चाय और चाय …अनवरत दौर इस चाय के! पतिदेव की ..बच्चों की धमकियों के बावजूद इस निगोड़ी चाय से इतनी मुहब्बत है की क्या बताएं ! उदास मन को ठीक करने का ..ख़ुशी को ज़ाहिर करने का ..थकावट दूर करने का ..तबियत ठीक करने का एक ही नुस्खा जो हमेशा उपहास का पात्र बनता है मेरी महफ़िलो में पर फिर भी मेरी जान है .! खाने में कोई नखरा नहीं ..जो मिल जाए जो बन जाए .! हाँ …बच्चों की पति की फरमाइश पूरी करने में एक तृप्ति का एहसास होता है और वही मेरा भी पंसदीदा व्यंजन बन जाता है !

7.जीवन का सबसे ख़ुशी का पल :

जब मेरे एक लेख को पढ़कर ‘रश्मि  प्रभा जी ” ने मुझे इनबॉक्स में अपना नंबर  देकर कहा कि मैं उनसे बात करू और उन्होंने मुझे अपनी पुस्तक ”नारी विमर्श के अर्थ ”  में एक लेख लिखने के लिए आमंत्रित किया और  प्रोत्साहित किया ! ज़िन्दगी में बहुत से पल हमे ख़ुशी दे जाते हैं पर तब अधिक प्रसन्नता होती है जब आपको अपने मन का कुछ करने का अवसर मिलता है ! ईश्वर का शुक्र करती हूँ की मुझे या पल बार बार मिलते हैं जब मुझे मेरी रचना के लिए प्रशंसा मिलती है जिससे मुझे निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है !
8. मुझे अच्छा लगता है जब .. :

साहित्य से मेरे इस लगाव को लोग पहचानने लगे हैं ..मुझे अच्छा लगता है जब मुझे अब मेरी सखियाँ मेरे रिश्तेदार  मुझे ‘लेखिका’  शब्द के साथ अपना अपना रिश्ता जोड़कर जैसे लेखिका पत्नी..माँ ..या लेखिका दीदी कहकर पुकारते हैं ! सबसे  ज़्यादा  अच्छा लगा जब मेरे गुरुदेव ने ही मेरे किसी गुरुभाई को कहा कि  ” हाँ ..रश्मि ..वो तो बहुत अच्छा लिखती है ..”! इससे बढ़िया और अनमोल क्या हो सकता है जब गुरु मुखारवृन्द से ऐसे शब्द सुने ! अब यही दुआ है की मेरा ये लगाव साहित्य से बढ़ता जाए ..बढ़ता ही जाए !
9. मेरे पुस्तकालय में ..  : 

अनगिनत पुस्तकें …उपन्यास ..कविता संग्रह ..गुरु वाणी …अखबारों और पत्रिकाओं  के वो अंक जिन में मेरे लेख और कहानियां छपी ..सब पुस्तकों के नामों की सूची बहुत बड़ी है क्यूंकि पढ़ना ..पढ़ना और पढ़ना एक अंतहीन प्रक्रिया है  ! बस अब इस  प्रयास में …इस सपने को जीती हूँ की मेरे इस पुस्तकालय में मेरी अपनी लिखी कोई पुस्तक और उपन्यास सुसज्जित हो ! आप सब की दुआओं की तलबगार हूँ !

10. प्रतिलिपि के लिए मेरे विचार  : 

प्रति ..लिपि ..अर्थात  हर उस लेखक की रचना जिस में उसने अपने भावों को शब्दों की माला में पिरोकर एक लिपि में परिवर्तित कर पाठकों के समक्ष रखा हो …तो इस लिपी को पढ़ने के लिए लेखक और पाठक के बीच एक खूबसूरत कड़ी का काम करेगी ये ” प्रतिलिपि ”…! साहित्यकारों की रचनाओं को एक ही खूबसूरत जगह पढ़ने के लिए एक नए आयाम देती हुई एक कोशिश ..एक ज़रिया …

पाठकों के लिए सन्देश ..

बढ़िया साहित्य से रूबरू होना और उन्हें अपने दिल की गहराईओं से पढ़ना सबसे अहम बात है ! कुछ आप पढ़िए, कुछ हम पढ़ कर साँझा करे ….सिलसिला यूँ ही ये चलता रहे …! कुछ कदम आप बढ़िए कुछ हम बढे ..कारवां यूँ ही चलता रहे ….!! आमीन …..

Published works on Pratilipi :

       

        

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