आज के मेहमान: युवा लेखक राजीव उपाध्याय जी / A short interview with Rajeev Upadhyay

नाम : राजीव उपाध्याय

जन्मदिवस : 29 जून 1985

मूलस्थान : बलिया, उत्तर प्रदेश

शैक्षिक उपाधि : पी एच डी (अध्ययनरत)

1. स्वभाव :

मैं स्वभाव से अंतर्मुखी हूँ। अक्सर अपनी बात कह नहीं पाता हूँ और शायद यही वजह है कि वो शब्दों के रूप में कागज पर ढलती जाती हैं।

2. खास शौक :

गजलें सुनना एवं विभिन्न विषयों पर किताबें पढना।

3. आपके जीवन में किन तीन लोगों ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया है?

जीवन के विकास क्रम में बहुत लोगों ने प्रभावित किया है परन्तु जहाँ तक सिर्फ तीन लोगों की बात है तो मैं जिन तीन लोगों का नाम लूँगा उनमें सबसे पहले मेरे पिताजी हैं जिनसे मैंने जीवन के सारे पाठ पढे हैं चाहे जीवन हो या फिर कविता। दूसरे स्थान पर हजारी प्रसाद द्विवेदी जी हैं जिनसे ये सीखा कि गद्य भी काव्य का ही एक रूप है। तीसरे व्यक्ति हैं निदा फ़ाजली जिनकी शायरी मुझे हर बार तरोताजा कर देती है।

4. अगर कोई बिल्कुल अनजान आदमी आपसे कहे की उसे आपकी अमुक पुस्तक/कहानी/कविता बहुत पसंद आई, तो आपको कैसा लगेगा?

पाठकों की प्रतिक्रियाएं किसी भी रचनाकार के विकासक्रम में अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती हैं और सकारात्मक प्रतिक्रिया अवश्य ही उत्साहवर्धक एवं संतोषकारी होगी।

5. आपके जीवन की सबसे बड़ी चाह कौन सी है?

हर रचनाकार की तरह मैं भी अपने लेखन से अपने पाठकों पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ना चाहता हूँ जो उनके आत्मिक एवं वैचारिक विकास में सहयोगी हो पर किसी तरह का अधिकार नहीं चाहता हूँ। अगर चाहता हूँ तो सिर्फ सकारात्मक प्रभाव; चाहे वो क्षणिक हो या फिर अमिट।

6. अगर अपनी जिंदगी फिर से जीने का मौका मिले तो क्या बदलना चाहेंगे?

अगर मौका मिला तो मैं माँ को फिर से पाना चाहूँगा। कुछ और वक्त गुजारना चाहूँगा। काश ये हो पाता।

7. आपके बचपन का सबसे यादगार किस्सा क्या है?

ये बात तब की है जब मैं दसवीं में पढता था। तब मैं स्वभाव से बहुत ही उग्र एवं कुछ हद तक हिंसक भी था। तब जाने क्यों सांपों को देखते ही मारने दौड़ पड़ता था। जून 2000 की एक दोपहर थी और मैं बगीचे में लेटा था कि छोटा भाई आकर बताया कि उसने एक सांप देखा है। ये सुनना था कि मैं डण्डा लेकर उसके साथ दौड़ा और आनन-फानन में सांप को मार भी डाला। तभी उसने बताया कि सांप का जोड़ा भी है। ये सुनना था कि मैं अन्दर तक सहम गया और सोच लिया कि जोड़े को भी मारूँगा।

ये सोचकर मैं जोड़े का इन्तज़ार करने लगा क्योंकि मैंने सुना था कि सांप अपने जोड़े को छोड़कर नहीं जाते और दूसरे सांप ने भी लोगों की बातों को सही साबित किया और वो अपने प्रेमी को देखने आया। जैसे ही मैंने जोड़े को देखा मारने की कोशिश की पर असफल रहा। बस धाव ही दे सका। मैंने इन्तज़ार किया और वो सांप फिर आया। मैंने फिर वार किया पर असफल रहा। सांप तीसरी बार भी लौटकर आया और मैंने फिर कोशिश कि और शायद गहरा चोट करने में सफल रहा पर वो सांप झाड़ियों में चला गया। मैं पुनः इन्तज़ार करने लगा पर इस बार वो लौटकर नहीं आया।

जैसे-जैसे मेरा इन्तज़ार बढता गया मेरे मनोभावों में बदलाव आता गया। मैं सोचने लगा कि इस जानवर में प्रेम इतना गहरा है कि उसने अपने जीवन को कई बार खतरे में डाला और मैं उसके प्रेम में बाधक बना। मुझसे बेहतर तो ये सांप ही है। ये बात मेरे अन्दर आत्म-ग्लानि का भाव पैदा कर दिया। मेरी मनोस्थिति हताशा की गहराइयों डुबने लगी। मनःस्थिति ऐसी हो गई कि मैं प्रार्थना करने लगा कि हे भगवान उस सांप से कहो कि वो आकर मुझे काट ले। और ये सोचकर मैं वहीं खाट बिछाकर सो गया। घंटों तब तक कि जब तक माँ बुलाने नहीं आई। उस दिन से मेरा पूरा स्वभाव ही बदल गया। जहाँ मैं बहुत हद तक बहिर्मुखी था कि मैं अंतर्मुखी हो गया।

8. प्रतिलिपि के विषय में आपके विचार :

पाठकों और रचनाकारों के बीच एक जोडने वाली सेतु की कमी है जो पाठकों कि अपेक्षाएं रचानाकोरों तक पहुँचा सके और इसे वर्तमान की पत्रिकाएं प्रदान करने में असफल सिद्ध हुई हैं। आशा एवं ईश्वर से प्रार्थना है कि पतिलिपि अपने नये विचारों एवं तकनीकी संसाधनों से पूरा करने में सफल होगी।

पाठकों के लिये संदेश:

आपके जीवन की सच्चाई और उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ आपके जीवन में है ना कि किसी विचार या तर्क में। तर्क और विचार दोनों महत्त्वपूर्ण हैं परन्तु ये जीवन के लिए हैं ना कि जीवन इनके लिए। अतः जीवन जानिए क्योंकि तर्क एवं विचार जीवन के चेरी हैं।

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